न तो ‘मुक्त’, न ही ‘न्यायसंगत’? भारत–न्यूजीलैंड FTA पर सियासी तूफान, सरकार के भीतर ही उठे सवाल
नई दिल्ली/वेलिंगटन
भारत और न्यूजीलैंड के बीच हाल ही में संपन्न हुआ मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement – FTA) जहां दोनों देशों की सरकारों द्वारा “ऐतिहासिक” और “भविष्य की अर्थव्यवस्था को दिशा देने वाला” बताया जा रहा है, वहीं न्यूजीलैंड की घरेलू राजनीति में इसने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। देश के विदेश मंत्री और न्यूजीलैंड फर्स्ट पार्टी के प्रमुख विंस्टन पीटर्स ने इस समझौते को सिरे से खारिज करते हुए इसे “न तो फ्री और न ही फेयर” करार दिया है। उनकी इस तीखी प्रतिक्रिया ने सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर गहरे मतभेदों को उजागर कर दिया है।

पीटर्स का आरोप है कि भारत–न्यूजीलैंड FTA के तहत उनकी सरकार ने जरूरत से ज्यादा रियायतें दे दीं, लेकिन बदले में न्यूजीलैंड को अपेक्षित और ठोस फायदे नहीं मिले। खासकर देश के अहम कृषि और डेयरी सेक्टर को लेकर उनकी चिंता ने इस बहस को और तेज कर दिया है।
समझौता, जो विवाद की वजह बन गया
भारत और न्यूजीलैंड के बीच FTA को दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में एक बड़े मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब भारत तेजी से उभरती वैश्विक अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है और न्यूजीलैंड एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपने व्यापारिक अवसरों को विस्तार देना चाहता है।
सरकारी दावों के अनुसार, इस FTA से अगले पांच वर्षों में भारत–न्यूजीलैंड के बीच द्विपक्षीय व्यापार दोगुना हो सकता है। वर्तमान में दोनों देशों के बीच व्यापार का स्तर अपेक्षाकृत सीमित है, लेकिन इस समझौते के बाद इसे नई ऊंचाइयों पर ले जाने की उम्मीद जताई जा रही है।
हालांकि, जिस समझौते को सरकारें आर्थिक उपलब्धि बता रही हैं, उसी पर न्यूजीलैंड के विदेश मंत्री ने सवालों की बौछार कर दी है।
विंस्टन पीटर्स का विरोध: “खराब सौदा”
न्यूजीलैंड की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली रहे विंस्टन पीटर्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक विस्तृत पोस्ट के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी न्यूजीलैंड फर्स्ट इस समझौते का “अफसोस के साथ विरोध” करती है।

पीटर्स के शब्दों में,
“यह समझौता न तो मुक्त व्यापार की भावना को दर्शाता है और न ही यह न्यूजीलैंड के लिए न्यायसंगत है। हमने बहुत कुछ दे दिया, लेकिन बदले में हमें वह नहीं मिला, जिसकी उम्मीद की जा रही थी।”
उनका मानना है कि इस FTA में इमिग्रेशन और निवेश जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में न्यूजीलैंड ने जरूरत से ज्यादा रियायतें दी हैं, जबकि देश के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों—खासकर डेयरी—को पर्याप्त सुरक्षा और लाभ नहीं मिल पाए।
डेयरी सेक्टर पर संकट का डर
न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्था में डेयरी उद्योग की भूमिका बेहद अहम है। देश की पहचान ही बड़े पैमाने पर डेयरी उत्पादों के निर्यात से जुड़ी हुई है। ऐसे में पीटर्स का यह कहना कि यह समझौता किसानों के लिए “खराब सौदा” है, राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पीटर्स ने कहा,
“यह न्यूजीलैंड के किसानों के हित में नहीं है। इसे हमारे ग्रामीण समुदायों के सामने जायज ठहराना असंभव है।”
उनका आरोप है कि भारत जैसे बड़े और प्रतिस्पर्धी बाजार के साथ समझौते में न्यूजीलैंड को अपने किसानों के हितों की बेहतर सुरक्षा करनी चाहिए थी। डेयरी उत्पादों पर अपेक्षित स्तर तक शुल्क में कटौती या बाजार पहुंच न मिलने को वे इस समझौते की सबसे बड़ी कमजोरी मानते हैं।
आव्रजन और निवेश पर उठे सवाल
FTA के तहत आव्रजन (इमिग्रेशन) से जुड़े प्रावधान भी विवाद की जड़ बने हुए हैं। विंस्टन पीटर्स का कहना है कि भारत को इस मोर्चे पर जरूरत से ज्यादा रियायतें दी गई हैं। उनके अनुसार, इससे न्यूजीलैंड के श्रम बाजार और सामाजिक ढांचे पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।
पीटर्स का यह भी दावा है कि निवेश के मामले में भी संतुलन नहीं रखा गया। जहां भारत को न्यूजीलैंड में व्यापक अवसर मिलेंगे, वहीं न्यूजीलैंड को भारत में अपेक्षित सुरक्षा और लाभ की गारंटी नहीं मिलती दिख रही।
सरकार का पक्ष: “ऐतिहासिक और लाभकारी”
विपक्ष और गठबंधन सहयोगियों की आलोचना के बावजूद न्यूजीलैंड सरकार इस समझौते को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही है। प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लकसन ने FTA का जोरदार बचाव किया है।
लकसन ने कहा,
“भारत का विशाल आकार और तेज आर्थिक विकास न्यूजीलैंड के लिए नौकरियों, निर्यात और आर्थिक वृद्धि के बड़े अवसर पैदा करता है।”
उनका मानना है कि भारत जैसे तेजी से बढ़ते बाजार तक बेहतर पहुंच न्यूजीलैंड के निर्यातकों के लिए दीर्घकालिक फायदे लेकर आएगी, भले ही इसके परिणाम तुरंत न दिखें।
सरकार का यह भी कहना है कि इस समझौते के तहत भारत को होने वाले न्यूजीलैंड के 95 प्रतिशत निर्यात पर शुल्क या तो समाप्त कर दिया जाएगा या उसमें भारी कटौती होगी। इनमें से आधे से अधिक उत्पादों को पहले ही दिन से ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिल जाएगा।
भारत को क्या मिलेगा?
FTA के तहत भारत के सभी उत्पादों को न्यूजीलैंड के बाजार में शुल्क-मुक्त पहुंच मिलने की बात कही गई है। इससे भारतीय टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाओं, ऑटो पार्ट्स और कृषि आधारित उत्पादों को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत की “एक्ट ईस्ट” और “इंडो-पैसिफिक” रणनीति के अनुरूप है, जिसमें भारत अपने व्यापारिक साझेदारों का दायरा लगातार बढ़ा रहा है।
20 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता
न्यूजीलैंड सरकार ने अगले 15 वर्षों में भारत में लगभग 20 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता भी जताई है। इसे दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को नई मजबूती देने वाला कदम माना जा रहा है।
सरकार का दावा है कि यह निवेश इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, कृषि तकनीक और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जिससे भारत में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और न्यूजीलैंड की कंपनियों को भी वैश्विक विस्तार का मौका मिलेगा।
चुनावी वादे और राजनीतिक दबाव
यह FTA न्यूजीलैंड की घरेलू राजनीति से भी गहराई से जुड़ा है। प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लकसन की नेशनल पार्टी ने 2022 के चुनावों में वादा किया था कि सत्ता में आने पर भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते को अपने पहले कार्यकाल में अंतिम रूप दिया जाएगा।
अब जबकि यह समझौता हो चुका है, सरकार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। लेकिन विंस्टन पीटर्स की नाराजगी ने यह साफ कर दिया है कि गठबंधन सरकार के भीतर इस मुद्दे पर एकराय नहीं है।
गठबंधन में दरार?
न्यूजीलैंड की सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार में पहले से ही विभिन्न मुद्दों पर मतभेद सामने आते रहे हैं, लेकिन भारत–न्यूजीलैंड FTA ने इन मतभेदों को सार्वजनिक मंच पर ला दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह विवाद गहराता है, तो इसका असर सरकार की स्थिरता और नीति-निर्धारण पर भी पड़ सकता है। खासकर ग्रामीण इलाकों और किसानों से जुड़े मुद्दों पर विरोध सरकार के लिए चुनौती बन सकता है।
आगे क्या?
फिलहाल, भारत और न्यूजीलैंड की सरकारें इस समझौते को लेकर सकारात्मक रुख बनाए हुए हैं। दोनों देशों का कहना है कि FTA का असली लाभ समय के साथ सामने आएगा और यह केवल व्यापार ही नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूत करेगा।
वहीं, न्यूजीलैंड के भीतर इस बात पर बहस जारी है कि क्या यह समझौता वास्तव में देश के दीर्घकालिक हितों में है या नहीं। विंस्टन पीटर्स की तीखी प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में न्यूजीलैंड की राजनीति में और गर्मा सकता है।
एक तरफ “आर्थिक अवसरों” की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ “राष्ट्रीय हितों” को लेकर आशंका। भारत–न्यूजीलैंड FTA अब सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि दोनों देशों—खासकर न्यूजीलैंड—की आंतरिक राजनीति और भविष्य की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन चुका है।
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